Kesari Veer Review: क्या कमजोर पटकथा में दब गई वीरता की सच्ची कहानी? सुनील शेट्टी के सामने फीके पड़े सूरज पंचोली
भारतीय सिनेमा में जब भी देशभक्ति, शौर्य और साहस की बात होती है, तो दर्शक एक ऐसी कहानी की अपेक्षा करते हैं जो उन्हें प्रेरित करे और भावनात्मक रूप से जोड़े। इसी उम्मीद के साथ रिलीज़ हुई फिल्म ‘Kesari Veer’ ने एक सच्ची घटना पर आधारित कहानी को बड़े पर्दे पर लाने का प्रयास किया है। लेकिन क्या यह फिल्म अपने मकसद में पूरी तरह कामयाब हो पाई है? आइए इस विस्तृत रिव्यू में जानते हैं।
असली कहानी पर आधारित है ‘Kesari Veer’
‘Kesari Veer’ एक सच्चे सैनिक की गाथा है, जिसने देश के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। फिल्म की मूल आत्मा प्रेरक और भावुक है। कहानी एक ऐसे जांबाज फौजी की है, जिसने 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान असंभव को संभव कर दिखाया। ऐसे विषय पर फिल्म बनाना आसान नहीं होता क्योंकि दर्शकों की अपेक्षाएं बहुत ऊंची होती हैं।

दमदार शुरुआत, लेकिन पटकथा में कमी
फिल्म की शुरुआत जबरदस्त होती है — युद्ध के दृश्य, देशभक्ति से लबरेज संवाद और सिनेमैटोग्राफी आपको कहानी से जोड़ देती है। लेकिन जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती है, इसकी पटकथा कमजोर पड़ने लगती है। निर्देशक ने भावनाओं को तो दिखाया है लेकिन कई जगहों पर स्क्रिप्ट बिखरी हुई लगती है। युद्ध की गंभीरता और सैनिकों की आंतरिक संघर्ष को सही ढंग से पेश नहीं किया गया।
सुनील शेट्टी की दमदार वापसी
फिल्म में सुनील शेट्टी एक अनुभवी सैन्य अधिकारी के रूप में नजर आते हैं।
लंबे समय बाद उन्हें बड़े पर्दे पर देखकर दर्शकों को उत्साह जरूर हुआ। उनकी बॉडी लैंग्वेज, डायलॉग डिलीवरी और सैनिक के किरदार में उतरने की कोशिश काबिल-ए-तारीफ है। वे हर फ्रेम में गंभीरता लाते हैं और पूरी फिल्म को अपने कंधों पर संभालते नजर आते हैं।
सूरज पंचोली का प्रयास, लेकिन छाप नहीं छोड़ पाए
सूरज पंचोली फिल्म में एक युवा सैनिक की भूमिका में हैं। उन्होंने अभिनय में मेहनत की है, लेकिन वे सुनील शेट्टी की मौजूदगी के सामने फीके पड़ते हैं। उनके संवादों में आत्मविश्वास की कमी महसूस होती है, खासकर भावनात्मक दृश्यों में। हालांकि, कुछ दृश्यों में उनका अभिनय अच्छा है, लेकिन किरदार की गहराई को वो पूरी तरह पकड़ नहीं पाए।
तकनीकी पक्ष की समीक्षा
कैमरा वर्क और लोकेशन फिल्म की मजबूती हैं। युद्ध दृश्य, बर्फीली चोटियां और सेना की ट्रेनिंग दिखाने वाले सीन काफी रियलिस्टिक लगते हैं। लेकिन बैकग्राउंड म्यूजिक कई बार ओवरपावर कर जाता है, जिससे सीन की भावनात्मक गहराई प्रभावित होती है।
एडिटिंग भी थोड़ी लंबी लगती है। कुछ दृश्य ऐसे हैं जो फिल्म की गति को धीमा कर देते हैं, उन्हें काटा जा सकता था।
देशभक्ति के भाव तो हैं, लेकिन पकड़ नहीं बना पाई
फिल्म में कई ऐसे संवाद हैं जो देशभक्ति की भावना को जगाते हैं। खासकर एक डायलॉग जब सुनील शेट्टी कहते हैं, “मौत से डर नहीं लगता, अपने झंडे के नीचे मरने से गर्व होता है।” ऐसे संवाद दिल को छूते हैं। लेकिन फिल्म पूरी तरह से भावनात्मक ग्राफ नहीं बना पाती, जो दर्शक को कहानी के साथ बनाए रखे।
क्लाइमेक्स में आती है थोड़ी जान
फिल्म का क्लाइमेक्स अपेक्षाकृत अच्छा है। यहां एक्शन, इमोशन और सस्पेंस का मेल है जो दर्शकों को बांधकर रखता है। लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी होती है। फिल्म की पहली और दूसरी तिहाई में जो रफ्तार छूट चुकी है, उसे क्लाइमेक्स पूरी तरह संभाल नहीं पाता।
पारिवारिक दर्शकों के लिए है फिल्म
‘Kesari Veer’ एक पारिवारिक फिल्म है जिसे देशभक्ति से जुड़ी फिल्मों के शौकीन दर्शक एक बार देख सकते हैं। यह फिल्म युवाओं को भारतीय सेना के बलिदान की झलक जरूर देती है, लेकिन जिस जोश और जुनून की अपेक्षा थी, वह पूरी तरह नहीं मिलती।
निष्कर्ष (Conclusion):
‘Kesari Veer’ एक अच्छी कोशिश है, लेकिन कमजोर पटकथा और भावनाओं की कमी इसे एक महान फिल्म बनने से रोकती है। सुनील शेट्टी की दमदार मौजूदगी फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है, जबकि सूरज पंचोली को और मेहनत की जरूरत है। देशभक्ति की फिल्में एक खास भावनात्मक जुड़ाव की मांग करती हैं, जो यहां अधूरी सी लगती है।
यदि आप देशभक्ति फिल्मों के शौकीन हैं और सुनील शेट्टी की परफॉर्मेंस देखना चाहते हैं, तो एक बार जरूर देखें। लेकिन एक मजबूत स्क्रिप्ट की उम्मीद ना रखें।








